बस्ती: चार साल से ‘जल जीवन’ का इंतज़ार, एक आंधी में ढहा भ्रष्टाचार का मीनार!
सरकारी लूट की भेंट चढ़ी पानी की टंकी: चार साल की सुस्ती और घटिया निर्माण का नंगा सच।
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में ‘जल जीवन’ का मज़ाक: चार साल से निर्माणाधीन पानी की टंकी आंधी में ताश के पत्तों की तरह ढही
ब्यूरो, बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश):
- शंकरपुर में ‘जल जीवन’ का तमाशा: गन्ने के खेत में दफन हुआ सरकार का करोड़ों का सपना।
- ‘नल से जल’ का वादा या भ्रष्टाचार का इरादा? बस्ती में कागजी टंकी जमींदोज।
- बस्ती में जल जीवन मिशन की खुली पोल, मानक विहीन निर्माण का गवाह बना खेत।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ बस्ती जिले में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की बलि चढ़ गई है। विक्रमजोत विकास क्षेत्र की ग्राम पंचायत शंकरपुर में बन रही पानी की टंकी महज एक आंधी का बोझ नहीं झेल सकी और ढहकर किसान के गन्ने के खेत में जा गिरी। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सरकारी धन की लूट और गुणवत्ता से किए गए खिलवाड़ का जीता-जागता सबूत है।
चार साल की सुस्ती, एक रात का भ्रष्टाचार
हैरानी की बात यह है कि जिस टंकी का निर्माण चार साल पहले शुरू हुआ था और जिसे एक साल पहले ही बनकर तैयार हो जाना चाहिए था, वह अब तक अधर में लटकी हुई थी। चार साल की लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी न तो टंकी तैयार हुई और न ही गांव में पाइपलाइन बिछ सकी। सवाल यह है कि आखिर चार साल तक विभाग क्या कुंभकर्णी नींद सो रहा था? ठेकेदार की मनमानी और अधिकारियों की चुप्पी किसी बड़ी मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।

ग्रामीणों का आक्रोश: गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
टंकी के गिरने के बाद ग्रामीणों में भारी रोष है। नीरज सिंह, ईश्वरदीन, विनय, हौंसिला सिंह, शिवपूजन, गोपाल, पप्पू, राजकुमार, राम किशोर, संतराम और अवधेश सहित दर्जनों ग्रामीणों ने सीधे तौर पर निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री इतनी घटिया थी कि एक मामूली आंधी में ही करोड़ों की सरकारी संपत्ति ध्वस्त हो गई।
ग्रामीणों ने आक्रोश जताते हुए कहा, “अगर निर्माण कार्य मानक के अनुरूप होता, तो क्या इतनी आसानी से यह टंकी गिर जाती? यह सीधे तौर पर जनता के पैसे की बर्बादी है।”
जिम्मेदार कौन?
क्या ठेकेदार पर कोई कार्रवाई होगी? क्या विभागीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? एक तरफ सरकार हर घर तक नल से जल पहुंचाने का वादा कर रही है, वहीं बस्ती में जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी धन गन्ने के खेतों में दफन हो रहा है।
यह घटना जल जीवन मिशन के दावों की कलई खोलने के लिए पर्याप्त है। यदि समय रहते इस प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच नहीं कराई गई और दोषी ठेकेदार व संबंधित अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह भ्रष्टाचार का खेल ऊपर तक फैला हुआ है। बस्ती प्रशासन अब इस पर क्या रुख अपनाता है, यह देखने वाली बात होगी।










